🚆 कांगड़ा वैली रेलवे फिर शुरू: पठानकोट–बैजनाथ पपरोला–जोगिंदरनगर ट्रेन सेवा बहाल
हिमाचल प्रदेश और पंजाब को जोड़ने वाली ऐतिहासिक कांगड़ा वैली रेलवे पर यात्री ट्रेन सेवाएं करीब 4 साल बाद फिर से शुरू कर दी गई हैं। यह बहाली 2 जून 2026 से लागू हुई, जिससे स्थानीय लोगों और पर्यटकों में खुशी का माहौल है।
रेलवे अधिकारियों के अनुसार, यह सेवा अगस्त 2022 में चक्की नदी पर बने ब्रिटिश कालीन पुल को भारी बारिश और भूस्खलन से नुकसान पहुंचने के बाद बंद कर दी गई थी। इसके बाद लगभग 1,385 दिनों तक इस रूट पर रेल संपर्क बाधित रहा। यह पुल पठानकोट–जोगिंदरनगर रेल रूट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था, जो हिमाचल और पंजाब के बीच रेल संपर्क का प्रमुख माध्यम माना जाता है।अगस्त 2022 के बाद स्थिति और भी गंभीर हो गई क्योंकि लगातार बारिश और भू-स्खलन ने पहले से कमजोर हो चुके ढांचे को और नुकसान पहुंचाया। रेलवे इंजीनियरों ने शुरुआती निरीक्षण के बाद पाया कि पुल केवल सतही रूप से नहीं बल्कि उसकी नींव तक प्रभावित हो चुकी है, जिससे किसी भी ट्रेन को चलाना जानलेवा साबित हो सकता था। इसी वजह से इस पूरे सेक्शन को पूरी तरह बंद कर दिया गया। इस बंदी का असर स्थानीय लोगों, पर्यटकों और छोटे व्यापारियों पर भी पड़ा, क्योंकि यह रेल मार्ग हिमाचल के कई क्षेत्रों को जोड़ने वाला किफायती और आसान साधन था। यात्रियों को मजबूरी में सड़क मार्ग या लंबी दूरी वाले वैकल्पिक रेल मार्गों का सहारा लेना पड़ा, जिससे समय और खर्च दोनों बढ़ गए। धीरे-धीरे यह अस्थायी बंदी लंबी अवधि में बदल गई और लगभग 1385 दिनों तक इस रूट पर रेल संपर्क बाधित रहा। इस दौरान रेलवे विभाग ने पुल की मरम्मत और पुनर्निर्माण को लेकर कई तकनीकी सर्वे किए। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि केवल मरम्मत पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि नदी के बदलते प्रवाह और भविष्य की बाढ़ को ध्यान में रखते हुए संरचना को अधिक मजबूत और आधुनिक बनाना जरूरी है। इसके लिए नए डिजाइन, मजबूत नींव और बेहतर जल-प्रबंधन तकनीक पर काम किया गया। हाल के समय में इस पुल के निरीक्षण और पुनर्निर्माण कार्य में तेजी आई है, जिससे उम्मीद जताई जा रही है कि इस ऐतिहासिक रूट पर रेल सेवा फिर से बहाल की जा सकेगी। यह पुल न केवल एक इंजीनियरिंग संरचना है, बल्कि क्षेत्र के लोगों के लिए जीवन रेखा जैसा महत्व रखता है, इसलिए इसकी बहाली को स्थानीय स्तर पर काफी अहम माना जा रहा है।
अब रेलवे सुरक्षा आयुक्त (CRS) की मंजूरी और सफल निरीक्षण के बाद इस ऐतिहासिक नैरोगेज रूट पर नियमित ट्रेन संचालन दोबारा शुरू कर दिया गया है।
📜 कांगड़ा वैली रेलवे का इतिहास
कांगड़ा वैली रेलवे (Kangra Valley Railway) का निर्माण ब्रिटिश काल में किया गया था। इसे साल 1929 के आसपास यात्री सेवाओं के लिए शुरू किया गया माना जाता है। इस रेल लाइन को ब्रिटिश इंजीनियरों ने पहाड़ी इलाकों को जोड़ने के लिए बनाया था, ताकि कांगड़ा घाटी के दूर-दराज इलाकों को पठानकोट से जोड़ा जा सके।
इस ऐतिहासिक नैरोगेज लाइन को उस समय के North Western Railway (British India) द्वारा विकसित किया गया था। आज यह लाइन भारतीय रेलवे के Northern Railway Zone के अंतर्गत आती है।
यह रेल मार्ग अपनी प्राकृतिक सुंदरता, पुराने पुलों और बिना सुरंग वाले सफर के लिए जाना जाता है और इसे भारत की सबसे खूबसूरत रेल लाइनों में गिना जाता है।इसका निर्माण ब्रिटिश शासन के दौरान 1926 में शुरू हुआ और इसे 1929 में आम यात्रियों के लिए खोला गया। इस रेलवे लाइन को मुख्य रूप से जोगिंदर नगर में बन रहे शानन हाइड्रो प्रोजेक्ट के लिए भारी मशीनरी और सामान ढोने के उद्देश्य से तैयार किया गया था। यह रेल मार्ग अपनी अद्भुत इंजीनियरिंग के लिए जाना जाता है। पहाड़ी इलाके में होने के बावजूद इसमें बहुत कम ढलान (gradient) रखा गया है, जिसके कारण यह लंबा और घुमावदार रास्ता बनाता है। इस लाइन में करीब 900 से 1000 पुल, कई छोटे-बड़े मोड़ और कुछ सुरंगें शामिल हैं। रास्ते में धौलाधार पर्वत श्रृंखला के शानदार दृश्य, हरे-भरे खेत, नदी घाटियाँ और छोटे-छोटे गांव इसकी खूबसूरती को और बढ़ाते हैं। कांगड़ा वैली रेलवे को भारत की सबसे लंबी नैरो गेज रेलवे लाइनों में से एक माना जाता है और इसे एक महत्वपूर्ण हेरिटेज रेल रूट के रूप में भी देखा जाता है। इसका अधिकतम ऊंचाई वाला स्टेशन अहजू है, जो लगभग 1290 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इस रूट पर कुल 30 से अधिक स्टेशन आते हैं, जिनमें कांगड़ा, पालमपुर, बैजनाथ-पपरोला और ज्वालामुखी रोड जैसे प्रमुख स्टेशन शामिल हैं। इस रेलवे का महत्व सिर्फ परिवहन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हिमाचल की संस्कृति, पर्यटन और स्थानीय जीवन से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। लंबे समय तक यह रूट स्थानीय लोगों के लिए सबसे सस्ता और भरोसेमंद साधन रहा है। हालांकि समय-समय पर प्राकृतिक आपदाओं, भूस्खलन और पुलों को नुकसान के कारण इसकी सेवाएं बाधित भी होती रही हैं। आज भी कांगड़ा वैली रेलवे को “टॉय ट्रेन ऑफ हिमाचल” के नाम से जाना जाता है और यह भारत की उन चुनिंदा रेल लाइनों में से एक है जो ब्रिटिश काल की इंजीनियरिंग, प्राकृतिक सौंदर्य और पहाड़ी जीवन को एक साथ जोड़ती है।
📌 मुख्य जानकारी
- सेवा लगभग 4 वर्षों से बंद थी
- चक्की पुल के निर्माण पर लगभग ₹70 करोड़ खर्च किए गए
- रेल सेवा शुरू होने से कांगड़ा, नूरपुर, ज्वालामुखी, पालमपुर और बैजनाथ क्षेत्र के यात्रियों को बड़ी राहत मिलेगी
- पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है
🌄 कांगड़ा वैली रेलवे की खासियत
- लगभग 164 किलोमीटर लंबा ब्रिटिश कालीन नैरोगेज ट्रैक
- पूरी लाइन में एक भी सुरंग नहीं
- चाय बागान, पहाड़ और घाटियों से गुजरता सुंदर मार्ग
- डलहौजी रोड, नूरपुर, कांगड़ा, पालमपुर जैसे प्रमुख स्टेशन
- भारत की सबसे खूबसूरत ट्रेन यात्राओं में से एक
🚉 नई ट्रेन टाइमिंग (Pathankot–Baijnath Paprola)
🟢 पठानकोट → बैजनाथ पपरोला
- ट्रेन 52465 – 05:00 AM प्रस्थान | 12:00 PM आगमन
- ट्रेन 52467 – 07:00 AM प्रस्थान | 01:40 PM आगमन
🔵 बैजनाथ पपरोला → पठानकोट
- ट्रेन 52470 – 02:15 PM प्रस्थान | 09:45 PM आगमन
- ट्रेन 52474 – 03:40 PM प्रस्थान | 10:50 PM आगमन
📈 पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को फायदा
इस रेल सेवा की बहाली से हिमाचल प्रदेश के पर्यटन क्षेत्र को बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है। धर्मशाला, पालमपुर और कांगड़ा जैसे क्षेत्रों में होटल, होमस्टे और स्थानीय व्यापार को नई गति मिलेगी।
- पर्यटन में वृद्धि
- होमस्टे और होटल व्यवसाय को बढ़ावा
- स्थानीय व्यापारियों को सस्ता परिवहन
- चाय बागान और गाइड्स की आय में सुधार
⚠️ जरूरी यात्रा सलाह
रेलवे ने यात्रियों को सलाह दी है कि यात्रा से पहले NTES ऐप या स्टेशन से लाइव टाइमिंग जरूर चेक करें क्योंकि शुरुआती दिनों में शेड्यूल में बदलाव संभव है।
🧭 निष्कर्ष
कांगड़ा वैली रेलवे की बहाली सिर्फ एक ट्रेन सेवा की वापसी नहीं है, बल्कि यह हिमाचल की ऐतिहासिक लाइफलाइन का पुनर्जागरण है, जो पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार देगा।


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